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Friday, 26 August 2022

खयाल

यह मेरा करतब है
शुरुआती दौर में
वो बन जाना
जिसे तुम जानना चाहो
फिर वैसा रहने में
लाखों कुशल तरीकों से
चूकते जाना 
हमारी सदी के गुजरने तक।

Hindi Trans. of Tom Snarsky's Wish

Friday, 12 August 2022

फिर भी

इश्क़, गर इश्क़ है, मिटता नही
हममें ही रच बसता है,
जैसे जमीन से लिपटा सोना,
कि धूप खिले,
जी उठे।
(Hindi trans. of Alice Walker's Even So)

Sunday, 7 August 2022

एक झरने में, रेक्जाविक

मुझे अभी भी लगता है,

कि दुनिया
वो रोटी है
जो आधी
तुम्हारे लिए ही
मैं थामे खड़ी हूं।

(Hindi Trans. of Eileen Myles- 'At a waterfall, Reykjavik')

Wednesday, 3 August 2022

वहां पहुँचना...

दिमाग़ कहे: यह नदी हैं हर तल से परे दिल कहे: बनाए यहीं पूल के सिलसिले

(Hindi trans. of Cleo Wade's Getting There)

Wednesday, 22 January 2020

Moving on

I
Memory maps
unfold to let go a drifter.
A question lingers -
how do you nourish (without) your
sources of affection, Mister?

II
(A friend responds)

A question lingers,
do you have a yen to nurture?
If yes, how did your hard edges come about?
I have been told, guess his affection, when in doubt.

Tuesday, 21 January 2020

बस इतनी सी बात है...


I
कुछ मोहब्बतें बिस्तर में सिमटती हैं,
कुछ रूह में उतरती है,
और कुछ बस खामाखाँ होती हैं,
क्या ही होता जो
मेरी रूह तेरा बिस्तर होती।

II
कुछ मोहब्बतें बिस्तर में सिमटती हैं,
कुछ रूह में उतरती है,
और कुछ बस खामाखाँ होती हैं,
कुछ इधर, कुछ उधर
तुम खामाखाँ ही हो,
ना इधर, ना उधर।

Sunday, 19 January 2020

तलब | ख़लल

आज बड़ी तलब है
तुम से बात करने की,
लफ़्ज़ों के लिहाफ़ मे लिपटी
मोहब्बते सिलसिलेवार नही उतरती,
धूप सी बिखर जाती हैं,
धान बन खिल उठती हैं,
खनकती हुई भीतर कहीं।
सोच थी मेरी
तुम तक पहुंचने की,
रूह से रूह को राहत है
रूमी की ऐसी रूमानी बातें
तलब को ख़लल कर गई।

Monday, 2 July 2018

उलझन

कल 
मेरे रुमाल की हर एक गाँठ
किसी ख़ास ख़्वाहिश की दास्ताँ थी
जिसमें तुम थे और मैं थी।
आज
खुली गाँठें, 
रुमाल की सिलवटों में
जिरह कर रहे हैं
जिसमे तुम हो और मैं भी।

Saturday, 20 June 2015

here and how

here, I inhabit my shame, 
wrapped in hurtful inadequacy
afraid to let go of words
that might tell you that.
how does a self-reliant woman
confess -
she erased her questions to nurture yours?

Tuesday, 19 May 2015

'फिर लिखो, तूम'

(These are for you Akhil - thank you for not giving up on me!)

I
कैसे लिखूँ  
कि उदासी उबासी बन 
भीतर उबल रही है?
ख्याल बहुत हैं 
जुगाली के लिए, 
पर तंज़ करता अक्स 
दीखता है बैठे, घात मारे 
और, हर अक्षर उभरते उभरते 
सिकुड़ जाता है,
लाड़ की तलाश में।

II

उदास उलझनों में, 
पालथी मारे लफ़्ज़
तर्जुमे की बैसाखियाँ पकडे 
लड़खड़ाते, 
निकले हैं, अब 
हम-बीती का कारवां बनाते।

Saturday, 15 February 2014

हर्ज़ और हसरतें

Thanks to a dear friend for sharing her lovely English Poems. Some translations...


I
इस महीने, तुम्हारे रूखे शहर
झील जमे, इससे पहले, 
चटकती बर्फ़ के दायरों में 
समेटती खुद को, भर लेती हूँ
सर्द ख़ामोशी कि आह !


II
जबसे तुम गए 
नदी सिमट गयी 
आकाश तार-तार हुआ  
और जंगल ख़ाक़ । 
अब मैं,
अपनी ख़ामोशी को खुरचती,
पुकारती हूँ,
संजोयी चाहतों के साथ,
तुम्हारा नाम ।


III
तैरती हुई,
तुम्हारी आवाज़ पर फिसलती,
अपनी हंसी में तुम्हारी बुनते हुए,
तुम्हारी चुप्पी को दुलारती,
बिखरी हुई तुम्हारी निगाह को संभालती हूँ मैं, 
पर हर सुबह,
मेरे बिस्तर से चुरा लेते हों लफ़्ज़ तूम ।


IV
तुम्हारे लफ्ज़ों पर उंगलियां फेरते हुए 
ढूँढती हूँ दरारें कि ठहर सकूँ
छह सालों में सात बार 
रुके तुम, 
पर मैं अब भी 
झूझती हूँ कि जुदा हो सकूँ ।



Friday, 23 August 2013

रोमांच/रोमांस

तुम्हारी मेरी पहचान
शब्दों से बनी थी,
शुरुआत शायद ऐसे ही होती है
पर, अंत भी जब सतही शब्दों से हो,
तो कही गई हर बात
खुद से ही मुकरती है,
अब जैसे तुम्हे सुनकर मैंने दिलचस्प पाया,
शायद सुनते देख मुझे तुमने ख़ास पाया,
मुझे सुनने में तुम्हारी दिलचस्पी कभी दिखी नहीं,
फिर भी तुम्हारा कहना है --
कभी तुम मेरी हर बात ध्यान से सुनते थे,
सच? वो कौन सी बातें थी?
क्या उन बातों में मैं थी?
खैर छोड़ो,
गयी बात की क्या बात,
पर हाल फिलहाल जब पलटकर तुमने कहा,
'आई ऍम सॉरी',
तो लाज़वाब कर गए मुझे --
अफ़सोस जता रहे हो,
या माफ़ी बज़ा रहे हो
इस उलझन में चुप ही रही मैं !
तुम अंग्रेजी में कहते हो,
मैं हिंदी में सुनती हूँ
कही-सुनी महसूस कौन भाषा में की? क्या मालूम !
लिखे पढ़े लोग इन अल्फाजों की चुस्कियों में
रोमांच ढूँढ़ते हैं
और जैसे आनंद ने कहा
"'हर बार (कुछ नया) बनाने का रोमांस,
गिराता है एक बनी इमारत की नींव',
अब तुम्हारे लिए मैं दिलचस्प नहीं
और मेरे लिए तुम ख़ास नहीं !

Tuesday, 20 November 2012

पिछले पखवाड़े

पिछले एक पखवाड़े सेकुछ ऐसा लिखना चाहती थी
जो मेरे, तुम्हारे, हमारे बारे में ना हो;
जिसमें मैं, तुम, या हम ना हो;
जिसे पढ़ कर ये ना लगे
कि कोई सिरा तुमसे अब भी जुड़ा है;
ऐसे हर सिरे को ख़बरो की तरफ मोड़ दिया,
ख़बरो से किसी को लगाव नहीं होता
पर हर खबर, अतरंगी दुनिया से जोड़ते हुए,
केवल दो पाटो का आईना है - गया कल और आता कल
इनके बीच खामखाँ गुमसुम बीतता- अब
भर जाना लबो तक एक हिचकी;
खुद पर ही खीझती झिझक
सिलसिलेवार अखबारो की तह में भी
कोई मैं, तुम, और हम ढूंढ ही लेती है;
ख़ामोशी की सर्द दीवारें पिघलने लगती है;
और, मैं सोचती हूँ कि क्या लिख दूं 
क्यूँ,
ताजे आंकड़ों के अनुसार,
इन पन्नों को उलटने पलटने तुम भी आये थे इस पखवाड़े ?

Saturday, 9 June 2012

पैमाने

आज की रात के बहाने बहुत, हमारी सुबह के ठिकाने बहुत ।
था ख़ास दरमियाँ कुछ भी नहीं,पर मदहोशियो के सिरहाने बहुत ।।

चंद लफ़ज़ो को पलको पे उठाये, देखे तुम्हारे नजराने बहुत।
तुम्ही में संजोये गलियारे बहुत, तुम्ही में खोये चौबारे बहुत ।।

किसी से तुम्हारी शिकायतें बहुत, तुम से हमारी ख्वाहिशें बहुत ।
ऐसे बने अपने फ़साने बहुत, खामोशियो की ज़बाने बहुत ।।

बा मकसद दिल्लगी के निशाने बहुत, यूँ तो आये हमें भी समझाने बहुत ।
पर दिल्लगो में इत्तेफाकी बहुत, और दिल की लगी की मिसाले बहुत ।।

महफूज़ थी जो परछाई बहुत, तफसील से आज बतायी बहुत ।
तुम्हे प्यारे तुम्हारे माझी बहुत, हमारी उमीदें रूमानी बहुत ।।

हासिल सभी को मयखाने बहुत, हमारे-तुम्हारे पैमाने बहुत ।
आज की रात के बहाने बहुत, हमारी सुबह के ठिकाने बहुत ।।


Monday, 9 April 2012

retreat

seamlessly, easing out,
invisibly
in times that will now reminisce
of the time that passed by
strange pleasure in this
not knowing
not seeking
a collected self splintered now in multitudes
showing gravity its place
as i walk from this place to that
inside
outside
you were right
there are many forms of retreat
and mine began
while you were scribbling a discreet dream.

Saturday, 18 February 2012

letters

letters
that i write for him
you write for her
and we read for each other.
letters
that never reach him
that never reach her
and we keep together.
letters
we close
to dispose someday
letters
that we now embrace.

Monday, 28 November 2011

फिर?

फिर क्या,
शब्दो की व्यथा,
निरर्थक कथा;
अकेले खड़े
या, प्रांगन गढ़ा;
थिरकती कविता
कैसे बने;
जो कोई कहे,
कोई सुने
बीच कहीं,
नए रिश्ते बुने...

Thursday, 24 November 2011

सिरा

अब ऐसा क्यूँ होता है,
बातें तभी शुरू होती हैं
जब तुम करना चाहते हो,
ऊन की गेंद जैसे;
एक सिरा तुम मेरी तरफ उछालते हो
क्या तुम नहीं जानते,
सिरे जब खुलने लगते है;
तो साथ जोड़े तो रखते है
बांधते नहीं;
शायद तुम सोचते होंगे,
कि दूसरा सिरा मेरे पास है,
मैं भी ऐसा ही सोचती हूँ
शायद दूसरा सिरा तुम्हारे पास हो....

Thursday, 10 November 2011

गुफ्तगू

अभी अभी समझा, कि ;
अक्सर जिंदगी
गलियारों में ही;
कट जाती है,
इसलिए;
और कुछ न कहेंगे;
चुप रहेंगे,
फिर से;
मुल्तानी तख्ती पर
नए रंग भरेंगे,
पहली पहचान हो जैसे;
अपनी हस्ती से हम, अब;
गुफ्तगू करेंगे |

Sunday, 6 November 2011

बात ही बात में...

दिन की और रात की;
रात की बात की;
बात ही बात में;
रात भी काट दी;
काट के पार थी;
आरजू की चांदनी;
फिर सुबह और शाम थी;
शाम की तो बात थी,
जब शमा जल उठी;
जल के यूँ पिघल उठी;
जैसे कोई जाम हो,
जाम की संगीनियाँ;
धडकनों में आम हो,
बन के दिन रात ही;
चांदनी भी ढल गई;
तुम वहीं थे, बस वहीं;
वहीं, जहाँ यकीन था;
कभी तो होगी बात भी;
दिन की और रात की;
बात ही बात में;
शाम ये भी काट दी...