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Thursday, 6 September 2012

क्यूँ नर्बदा?

Photo by Pallav Thudgar
नर्बदा, क्यूँ तुम ही नहीं मुड जाती*
दिल्ली कि ओर;
कंपकपाती यमुना को ले
घेर लेती चीलों की संसद को?
क्यूँ, नर्बदा तुम भी
उंगली पकडे खड़ी हो;
हजारों उन चिंगारियों
को तेल देती?
नर्बदा, क्यूँ तुम ही नहीं
चट्टानों को चींर नया रास्ता बना देती,
उजाला जो दीयों तले है सब ओर फैला देती?

*नर्मदा घाटी में आम बोलचाल का हिस्सा

Friday, 23 December 2011

क्या होता है

बेखबर रात का
ओस में ढल जाना
ज़र्र ज़र्र करती हवा का
उन्नींदा पालने को हिलाना
आलसी आँखों का खुलना
और उस बूढी माई को सामने पाना
जिसने नर्मदा घाटी में
टकटकी बाँध कहा था
गाँव से मत जाना
क्या होता है
?