Showing posts with label Struggle. Show all posts
Showing posts with label Struggle. Show all posts

Monday, 27 May 2024

Palestine

The West inks red lines
filled with beheaded kids, 
of people peeled inside out,

And the rest of us hung dry. 

Will the winds turn?
If they do, what becomes of us?
If they don't, who are we? 

Friday, 22 December 2023

हलकान

थक चुकी हूँ मैं
इस इंतजारी में,
और तुम?

कि बने बेहतर,
खूबसूरत और मेहरबां दुनिया?

चलो चाकू ले,
बींच चीर दे दुनिया
देखें, चमडी खा रहे हैं, 
कौन से कीड़े, दुनिया

Hindi Tr. of Langston Hughes' Tired

Tuesday, 16 October 2018

तुम कब सीखोगे?

वो अकबर गुज़र गये,
जो अनारकली को दिवारों में चुनवा
तख्तनशीं रहे।
पर अनारकली के गीत,
दुर्गा की हुँकार का
वक़्त नही गुज़रता।
गवाह? अजी मेरी ज़मीं
- अच्छे दिन, ओछी हरकत
का बयानामा यहीं।
फिर ना कहना किसी ने समझाया नहीं
रेत, ग़ारा, ईंट लाते तुम्हे
मिट्टी-पलीत होने का मंज़र
दिखाया नहीं।

Monday, 2 July 2018

गंगा

एक नदी, कितनी राख
कब स्वाहा हुयी कहानियां
कुछ बह गयी
कुछ रह गयी 

Thursday, 3 March 2016

जे.एन.यू के लिये

(In solidarity, Hindi tr of my friend Akhil Katyal's poem' For JNU')

तुम सूरज चबा कर थूक सकते हो यहाँ,
मुस्टण्डों को धुल चटा सकते हो तुम यहाँ,
जनाब, विश्व विध्यालय की है बात यहाँ,
कोई राजा का दरबार नहीं, तलवों पर हो हम जहाँ !

Sunday, 6 October 2013

दिल्ली

tr. from Avinash Dharmadhikari's English poem 'Delhi'.

मेरा काम है
दिल्ली के बीज़ी चौराहे पे
गाड़ियों के शीशों की धुलाई
जैसे मारूति, एम्बेसडर, सोनाटा,
और मर्सिडीज़ भी

मेरी दाईं बाँह पर है
एक जलती सिगरेट का निशाँ
मुस्कुराते नौज़वानों ने सिखाया मुझे
नहीं छूना है इन कारों को कभी

मेरे पास पैंट है
और सर्दियों में
एक आध दिन के लिए ही सही
एक सरकारी रजाई भी

मुझे खाँसी है
जो जाती ही नही
और दस-एक मिनट को
खाना भी कभी कभी

मेरा एक दोस्त है
हम साथ सोते हैं,
या सोते थे, कभी जभी
ज्यादा कमाने के जुर्म में
किसी ने तोड़ डाले उसके पैर भी

मेरे पास है एक कहानी
मेरे मन में कहीं
सर्दियों में, बीरबल की कहानी
जो माँ ने सुनाई थी कभी

मेरे पास कहानी है
जाड़ों को जी लेने की
किसी बन्दे ने जीत ली थी एक रात
बर्फीले पानी में भी
तीन कोस दूर एक लैंप को देख देख
और उसकी आग, ताप, और रोशनी चुराकर ही

मेरे पास माँ है
मन ही में सही
जिसका ख़याल उन पलों से बुना
जहाँ मैंने माँ को सुना
और गढ़ी एक बेटे की छवि

मेरे पास सोने की जगह है
हर रात नई नई
या कुछ घंटो के लिए कभी,
मेरा क़ानून कहता है
और कहती है ठुल्ले की लात भी,
ना फूटपाथ मेरे हैं
और ना रेल की पटरी ही

मैंने थामे हैं सौ
कभी पांच सौ भी
सुबह से दुपहरी तक
और खा लिया भर पेट
किसी अनोखी शाम को कभी कभी

मेरे पास है तपता सूरज
सर्द बरसातें
तेज हवाएँ
और पथरीले फूटपाथ तले जमीं

मेरा काम है
मर्सिडीज़ की धुलाई
मैं हूँ...
दिल्ली

(thanks to Ashish Dha)

Thursday, 6 September 2012

क्यूँ नर्बदा?

Photo by Pallav Thudgar
नर्बदा, क्यूँ तुम ही नहीं मुड जाती*
दिल्ली कि ओर;
कंपकपाती यमुना को ले
घेर लेती चीलों की संसद को?
क्यूँ, नर्बदा तुम भी
उंगली पकडे खड़ी हो;
हजारों उन चिंगारियों
को तेल देती?
नर्बदा, क्यूँ तुम ही नहीं
चट्टानों को चींर नया रास्ता बना देती,
उजाला जो दीयों तले है सब ओर फैला देती?

*नर्मदा घाटी में आम बोलचाल का हिस्सा

Wednesday, 5 September 2012

एक श्रद्धांजलि फोन को

इस फ़ोन से कुछ अजीब ही रिश्ता था,
कुछ बेहतरीन समय इसने साथ देखे सुने
और; कुछ बेंतहा मुश्किल लम्हे इसने साथ गुजारे,
याद है कैसे बार बार हाथ लपक संभाल लेते थे
इस छोटे से दोस्त को; जब
इसपर ही कंई छोटे बड़े कर्येक्रमो की प्लानिंग होती थी,
घंटो इसे अपने कान से लगा;
कागजों पर आड़े तिरछे अक्षर लिखती रहती,
इस ओर से कुछ बोलती थी;
उस पार से साथी कुछ कहते थे,
फिर भी; एक साझेदारी थी
साथ संघर्ष करने की,
संघर्ष में साथ आगे बढ़ने की;
और ये दोस्त हमसफ़र ही तो था,
हाँ; कभी कभी इसकी बैटरी थक जाती थी,
लेकिन बिजली की तरंगो में खुद को झोंक तैयार हो जाती थी,
एक बार फिर उर्जा भर देने;
दोनों फिर लग जाते थे कुछ सुनने कुछ बोलने,
इस सुनने- सुनाने की प्रक्रिया में कुछ सपने बुनने;
इन सपनो का ताना बाना केवल सामाजिक था,
ये भी पूरा सच नहीं;
इसने भी कुछ अपनों का अंहकार देखा है,
कुछ अपनों का तिरस्कार सहा है;
कुछ संगी साथी इसी पर जुड़े,
कुछ से इसने समय- स्थान अंतर के बावजूद जोड़े रखा;
इसने भी अपनों की प्रतीक्षा
और; इन जटिल संबंधो की समीक्षा दोनों ही की,
इस प्रश्न को इसने भी कंई बार सुना,
- 'आखिर जब रिश्ते जोड़ने हो या तोड़ने
तब अधिकांश लोग क्यूँ फ़ोन की आड़ लेते हैं?'
वही फ़ोन जो बैटरी के बिना चल नहीं सकता;
जिसके बिना उससे कोई स्वर निकल नहीं सकता;
वही जो जब चल पड़ता है, तब एक औजार बन जाता है;
यह इस समय की निर्बलता है, या इस तकनीक की दुर्बलता?
फ़ोन आज फिर भौतिकतावाद में इंसानी रिश्तों का नया स्वरुप समझाता है;
और ना जाने कैसे तसल्ली देते हुए एक सच भी सुनाता है,
'बैटरी-फ़ोन-स्वर-तकनीक' के रिश्ते को नारीवादी लेंस से देख लेना भर नारीवाद नहीं
उसके प्रश्नो की धार में छुपे दंभ की काट ढूंढना नारीवाद है
ये वो दंभ है जो कोई पुरुष किसी महिला को नहीं सिखाता लेकिन जो दृष्टि का हिस्सा बन जाता है,
शरारती चुहल में ये अन्तिम चुटकी लेता है,
'अभी तो तुमने देखा क्या है, आगे आगे देखो इन्टरनेट क्या क्या दिखलाता है';
तब इसे कानो से लगाये, सोचती रह जाती हूँ और ना जाने कब कमबख्त सीने से लग जाता है|


Thursday, 30 August 2012

प्रकृति और पुरुष

मैंने पूछा,
'क्या हाल चाल?'
तुमने कहा,
'जंगलों को देखो, कट गए, छट गए
जमीन और तालाब जाने कहाँ सिमट गए'
मैंने पूछा,
'और सब ठीक?'
तुमने कहा
'जुगनू, पतंगे, केंचुए सब कहीं खो गए
सूरज को ढूंढते, मुंह ढाप सब सो गए'
मैंने पूछा,
'कैसे हो?'
तुमने कहा,
'सब तरफ शोर है, हर मुंडेर एक मोर है
कौए कोयला खा गए, क्या रात क्या भौर है'

तुमने पूछा,
'ठीक हो?'
(तुमने पूछा, अच्छा लगा)
मैंने कहा,
मैंने कुछ नहीं कहा
प्रकृति क्या कहे, किससे?
जवाब सुनने के लिए कोई नही था..


Thursday, 31 May 2012

टूटते मकान

Photo by Javed Iqbal
बंद दरवाजों के सामने
आज पहरेदार हैं कईं |
गारे मिटटी के इंसान,
गारे मिटटी के मकान,
इंसानो के भी;
मकानो के भी;
आज खरीदार हैं कईं |
ठहरी सी, उलझी सी
देहरी पर खड़ी है ज़िन्दगी
कभी अन्दर पनपती थी
आज बाहर सुलगती सी
सिसकना भूलकर
टूटती दीवारों के साथ
बिखरते रिश्तों को ताकती
छटपटाती, सीता
अटपटे सवालो से झूझती,
'कानून मेरे लिए? मैं कानून के लिए?
या, मैं भी कानूनन ही हूँ, बस यूँ ही?'
ना रोजी, ना रोटी
और अब बाकी इंट पत्थर के निशाँ भी नहीं
इस रामराज्य में, इंसान के कम
कानून के सिपहसलार हैं कईं |

Please see: Days of Demolition, a Photo album by Javed Iqbaal
Also, Day after demolition attempt

Friday, 25 May 2012

छिपकली

वो मचान
जहाँ तुम चढ़े बैठे हो,
उससे सब छोटा ही दीखता है,
शायद ऐसा भी लगता हो
कि; सब तुम से ही है
जैसे कोई छिपकली हो,
छत से ऐसा जुड़ाव
कि गोल गोल आँखो का मुआयना
खुद तक ही
सीमित रहे,
लगे कि वो नीचे उतरी
दुनिया उथलपुथल हो जाए शायद;
तुम्हे देखकर मैं सोचती हूँ;
वो छिपकली कैसे होतीं हैं
जो जमीन पर घूमती मिल जाती हैं,
क्या वो अचानक जमीन पर गिर जाती हैं
और उससे जुड़ जाती हैं?
या कभी यूँ ही कुछ हो जाता है कि;
छत से अपने जुड़ाव,
उससे दूर होने के अलगाव
को एक छलांग में भूल जाए,
पैराशूट खुल जाए मानो,
डर त्रिशंकु बन पीछे छूट जाए
और तुम उतर आओ जमीन पर;
पता चले,
छत से चिपकी रहने वाली छिपकली
आखिर क्या पर पाती है
नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे
आने वाली ही तो
सिंहगढ़ का किला दिलाती है |


Monday, 21 May 2012

स्याही ख़्वाब

लिखना तो बहुत कुछ था
पर कैसे लिखूं
कि ख़्वाबो कि स्याही काली क्यूँ है,
क्यूँ नीले सुनहरे आसमान
का रंग बर्फीला हो गया,
कैसे धानी घास
दूब से मुंह मोड़े है,
और क्यूँ हर शरारत
हर हरकत से हैरां ये शाम है?
१९४७ में रंगीले ख्वाब जो
हमने धानी घास से सुनहरे आसमान को देखते बुने थे;
वो अब बर्फीली दूब के साथ इस शाम के हमसफ़र हैं
और हम तुम जो हैं भी और नहीं भी,
इन्हें देखतें हैं और सोचतें हैं
क्या लिखें, किसे लिखें;
क्यूंकि किसी क्रांतिकारी की याद अब
सहानुभुतिक अपराध है,
नियामगिरि, जैतापुर, कून्दकुलम में सत्याग्रह
राष्ट्रद्रोह कहलाता है,
लिखने-पढने या कुछ गढ़ने की आज़ादी से
संविधान नाराज़ हो जाता है,
और ऐसा क्यूँ कर हो ये पूछा
तो हम और हमारे प्रश्न दोनो ही माओवादी होतें हैं,
गाँधी के तीन बन्दर आने वाले कल की तस्वीर है
जिनके गले में तख्ती बंधी है-
'आज़ादी वो जेल है जिसकी हदें हम खुद तय करते है',
ना बोले, ना लिखें, ना पढ़ें, ना सोचें, ना समझें,
ना कहें, ना पूछें, ना हँसे, ना रोयें-
-आज़ादी की शर्तें साफ़ हैं
पर ख़्वाबो की गैरत तो देखिये
स्याही बने जा रहे हैं
और इसी स्याही से धानी घास पर कुछ लिखें जा रहे है ....

Thursday, 1 March 2012

साहिब

कुछ इस अदा से
कहा उसने
'काफ़िर हो तुम,
तुम्हारा इरादा काफ़िर.
आलिम सब हमारे,
हमारे सब जाकिर'
तंगदिल, निजाम की हरकतें ऐसी
खुद साहिब के ईमान की सारी दलील
बेतासीर

Inspired by: The German's Hand. And the Doctor's Googly

Friday, 23 December 2011

क्या होता है

बेखबर रात का
ओस में ढल जाना
ज़र्र ज़र्र करती हवा का
उन्नींदा पालने को हिलाना
आलसी आँखों का खुलना
और उस बूढी माई को सामने पाना
जिसने नर्मदा घाटी में
टकटकी बाँध कहा था
गाँव से मत जाना
क्या होता है
?

Saturday, 26 November 2011

योनिपथ (dedicated to Linga-Soni)

Original Photo by Garima Jain (Tehelka). Here an adapted image found online.

वृक्ष न हों खडें
ना जियें, ना लडें
ना आदि, ना वासी हो
विकास मरूभूमि में
लिंगम तू,
रहे समर्थ, रहे समर्थ, रहे समर्थ,
योनीपथ,योनिपथ, योनिपथ I

मेरी जमीन सा मेरा रंग;
मेरी मिटटी सा मेरा तन;
सत्ता के रास में
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
छीन ले
योनिपथ, योनिपथ, योनिपथ I

कंपनियों के मुकाम पर
आवाम को कर बलि
विकास की राह पर
तू ना थमेगा कभी,
तू ना मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
योनिपथ, योनिपथ, योनिपथ I

हरवंश तुम कह गए,
"यह महान द्रश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु स्वेद रक्त से
लथपथ, लथपथ, लथपथ"
योनिपथ, योनिपथ, योनिपथ I

Thursday, 10 November 2011

nightmares and dreams

you were there
today,
weren't you?
when i walked past you at Trafalgar
banner in one hand
screams-'toris you must go'
the girl in blue pants tweeted on her blackberry
'come join us, for this is our story'
some played drums, others violin;
gliding gloriously, all of us in unison;
it was then that u turned;
as if; you were in a hurry;
as if; the ground beneath you was slippery;
and you wanted to take everyone into
the labyrinthine St' Paul's
choppers swirled by
you told us what occupation means
in the Westminster walls
i was right there;
behind you;
awaiting you to turn again,
for you to say once more;
'white paper- catch it, bin it, kill it'
to hold your eyes with mine;
and to tell you to count me in all your schemes,
for their nightmares are our dreams.

source: http://www.flickr.com/groups/student-protest-posters-and-placards/pool/show/


Thursday, 4 August 2011

Middle dichotomy

I have often wondered which is more free,
roots that explore the depths;

branches that explore the heights;
or is it the stem that anchors the two;

keeping both in sight?
Fuck, comes a friend's response
its your 'middle class' talking
not letting free and not letting go
but keeping the disguise quite!

Thursday, 21 July 2011

Juggler's Act

some words of caution;
and bits of advise,
'love...its nature is abrupt', says akhil
anil says, "these are difficult times"
for; between the two what is it,
that would suffice?
that must survive fire and
cut through ice?
looking for a vise;
I juggle,
when I want to speak about love;
I write about struggle.

Monday, 18 July 2011

केंचुओं

तुम कहाँ हों ?
गीली मिटटी में गट्ठे पड़े देख;
उनसे गुजरती सुरंग को देखा .
पर तुम नहीं मिले.
तुम्हारी खोज खबर लेने अक्सर निकल पड़ता है मेरा एक दोस्त;
उसे बर्दाश्त नही कि झूले के चाव में मैं तुम्हे भूला बैठूं;
हो सकता है कल के अखबार में गुमशुदा कॉलम में तुम्हारा जिक्र हो;
यह भी हो सकता है कि अपनी बनायीं सुरंगो में तुम गुमसुम बैठे हों,
पर, कहीं खुले में उठते बैठते, गिरगिट से पलटते, उलटते और हर चीज़ पर फिसलते;
दो हाथो से लडखडाती जबान को सँभालते,
इस जीव को देखकर तुम्हे वही तो नहीं हो गया जिसे ये 'Identity crisis' कहता है?
आस्तित्व की इस लड़ाई में हार मत जाना दोस्त,
तुम्हारी मिटटी को इसने रसायनों से भले ही घायल कर दिया हो
पर नरम से कड़क होती अपनी प्रेमिका को तो देखो,
उसका प्रतिरोध ही तुम्हारा होसला है,
तुम्हारे स्पर्श को तरसती,
सरस ही बिखरती
बरबस टकटकी बाँध तुम्हे ढूँढती,
अपनी बेखुदी में बस इतना ही पूछती
...केंचुओं तुम कहाँ हों ?

Also check:
India’s soil crisis: Land is weakening and withering

Saturday, 25 June 2011

घुसपैठिया

इन शब्दो की अजब माया है
कभी कविता बन बहते हैं
और कभी चुप्पी की कसक सहते हैं,
और ये चुप्पी भी कम नहीं,
कभी विराम दे आलिंगन सी चहकती है
और कभी शब्दो से अलग थलग सुलगती है
एक आगाज़ तो दूसरा मौन
समझ नहीं आता की
घुसपैठिया कौन!