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Friday, 2 January 2015

रंग, शब्द, धुन

tr from Anmole Prasad's English tr of Rajendra Bhandari's Nepali poem, 'Colour, Word, Tone.' From, The Oxford Anthology of Writings From North-East India, 2011, pg. 24-25

रात के आलिंगन में घुटती 
शहरी रोशनियों के माफ़िक, 
हम सब के भीतर बुझ रही है 
विश्वास कि ज्योति। 

किसी चीख के समान खुरदरी हमारी आवाज़, 
किसी मातम के समान दुःखद। 
किसी फूल के प्राकृतिक रंगों के समान
संजो लिया है दम्भपूर्ण पैतृक देवताओं को 
हमने अपने दिल-मंदिर में।

हम, सोल्ज़ेनित्स्यन 
अपने दिल के साइबेरियन कैम्पों में। 
हम, ट्रोट्स्की
सिर्फ रात की रोशनी में
एक दूसरे के चहरे देखतें हैं। 
नहीं ढूँढ पाते हम पौ फटने तक भी
हमारी गुल्लक, अलमारियां, बक्से, 
वंशजों के अवशेष 
राख में। 

हमारे शब्दों और धुनों की नक़ल करते, 
गीदड़ और भेड़िये हमें सुनाते हैं लोरियाँ। 
भुलक्कड़पन के अफ़ीमी संगीत में, 
किसी फ़र्ज़ी सपने में लेते हैं हम झपकियाँ। 

जिस दिल कि मौलिक संवेदनाएं ही 
भस्म कर दी गई हो --
उसे कंहाँ घर?  कहाँ बीहड़?

एक धुँधली जगह

tr from Arunachali poet Mamang Dai's English poem, 'An obscure place'. From Dancing Earth: An Anthology of Poetry from North-East India, pg. 88-89, 2009. 

हमारे वंश का इतिहास कहानियों से शुरू होता है ।
हमें नहीं पता कि जो भाषा हम बोलते हैं 
वो किसी लिखित अतीत से जुडी हैँ ।
कुछ भी निश्चित नहीं है।
वहाँ पहाड़ हैं । आह, वहाँ पहाड़ हैं । 
हमने हर एक चोटी चढ़ी। हम नदी किनारे सोयें । 
पर जीत के बारे में अबतक ना बोलें ।  

एक धुँधली जगह शिकारी को बार बार तंग करती है ।
इनाम दूर फिसल जाता है। 
कल महिलाओं ने अपना चेहरा छुपा लिया ।
बच्चों को बोलने से मना कर दिया । 
कल हमने कुछ आदमियों को पनाह दी थी,
जो जन्मभूमि के ख़ातिर हमारी पहाड़ियों को लांघ गए, उन्होंने कहा -- 
जो जानते हैं कि जानना क्या होता है, 
और सोते हुए घर, आदमी, और गाँव पत्थर बन गए । 

गर कोई मृत्य ना हो, तो खबरें शांत होती हैं 
गर केवल शांति हो, तो हमें अशांत होना चाहिए । 
सुनो, प्रार्थनाओं कि आवाज़ दबी-दबी होती है:

गर कोई अजनबी यहाँ से गुजरे 
तो उसे आकाश देखने देना ।
धूएं का बादल चींटियों का पीछा करता है ।
देखा!  उन्होंने जंगली बिल्ली को काट दिया 
और हार्नबिल को ग़हरी नींद में दफ़ना दिया । 
अजनबियों के लफ़्ज़ हमें उस धुँध में ले गए, 
जो उससे ग़हरी है जिसे हम पीछे छोड़ गए थे 
रोते हुए, लहलहाती घास के मैदानों के माफ़िक 
जहाँ हमारे पूर्वजों कि हड्डियां दबी हैं 
सुन्दर विचारों से घिरी ।

Sunday, 13 April 2014

मैं भारतीय गोली से मरना चाहता हूँ

tr from Robin S. Ngangom's English tr of Thangjam Ibopishak's Manipuri Poem, 'I want to be killed by an Indian Bullet'. From The Oxford Anthology of Writings From North-East India, 2011, pg. 56-57

वो मुझे ढूंढ रहे हैं यह ख़बर मैंने बहुत पहले सुनी; सुबह में, दोपहर में, रात में।  मेरे बच्चों ने मुझे बताया, मेरी पत्नी ने बताया मुझे । 

एक सुबह घुस आये वो मेरी बैठक में, वो पाँचों। अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश - जिन पाँचों के नाम हैं। वो आदमी बना सकते हैं; मिटा भी सकते हैं झक से। वो जो चाहे कर सकते हैं। पराक्रम के अवतार हैं। 

मैंने उनसे पूछा: 'कब मारोगे आप मुझे?'
लीडर बोला: 'अभी। बस अभी मारेंगे हम तुझे। आज बहुत शुभ दिन है। अपनी प्रार्थना कहो। क्या नहा चुके हो? क्या खाना खा लिया तूने ?

'आप क्यों मारेंगे मुझे? क्या है अपराध मेरा? क्या जुर्म किया है मैंने ?' मैंने उनसे फिर पूछा। 
'क्या तू ही वो कवि है जो लिखता है अंट-शंट और बकवास? या तू खुद को दिव्य शक्ति वाला संत समझता है? या फिर तू कोई पागल है?', लीडर ने पूछा। 

'मैं जानता हूँ कि पहली दोनों चीज़ों में से एक भी नहीं हूँ मैं। आख़िरी के विषय में आप को नहीं बता सकता। मैं खुद कैसे कह सकता हूँ की पागल हूँ या नहीं मैं ?'

लीडर बोला: 'तुम जो चाहे वो बन सकते हो। हमें इससे या उससे मतलब नहीं। हम तुझे मारेंगे अभी। हमारा मिशन है आदमियों को मारना ही।'

मैंने पूछा: 'किस तरह मारोगे आप मुझे? क्या छुरी से काटोगे? गोली मारोगे? या डंडे से पिटोगे मुझे?'
'हम गोली से उड़ायेंगे तुझे।'

'फिर किस बन्दूक से मारोगे मुझे? भारत में बनी या किसी और देश में ?'

'विदेशी। वो सब की सब बनी हैं जर्मनी में, रूस में, और चीन में। भारत निर्मित बंदूकों का हम उपयोग नहीं करते। अच्छी बंदूकें छोड़ो, प्लास्टिक के फूल भी नहीं बना सकता भारत। प्लास्टिक के फूल बनाने को कहो तो भारत केवल टूथब्रश पेश करता है।'

मैं बोला - 'यह तो अच्छी बात है। बिना खुशबू के प्लास्टिक के फूल किस काम के?'
लीडर बोला: 'कोई भी कमरा सजाने के लिए गुलदस्ते में टूथब्रश नहीं रखता। जीवन में थोड़ी सजावट जरूरी है।'

'चाहे जो भी हो, अगर आप मुझे मारना ही चाहते है तो कृपया भारत में बनी बन्दूक से मारिये। मैं विदेशी गोली से नहीं मरना चाहता। देखिये, मुझे भारत से बहुत प्यार है।'

'ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। हमारे सामने कभी भारत का जिक्र भी मत करना।'

ये कहते हुए वो चले गए मुझे मारे बिना; मानो उन्होंने कुछ किया ही नहीं।
ऐसे मौत के लिए अपनी नखरेबाजी से मैंने अपनी जान बचा ली। 

फ़तह

tr. from Desmond Kharmawphlang's English tr of his Khasi Poem, 'The Conquest'. From The Oxford Anthology of Writings From North-East India, pg. 61-62, 2011. 

अपने शहर की बात करते 
मैं कभी नहीं थकता। 
गर्मियों में गर्भित आकाश 
भावी बरसात से भरा,
सर्दियां पहुंची, अनमने सूरज के साथ 
छूती अकड़ी हई पहाड़ियां, झील पे 
ख्वाबों की कश्तियाँ । 

बहुत पहले, आदमी सुरमा के पार गए 
कारोबार करने, औरतों को घर लाने 
अपने वंश को बढ़ाने । 

फिर अंग्रेज आये 
सौगात लिए गोलियों, सुपारियों 
और धर्म की। 
लगातार जीत की तमंचे की नौंक पर 
शुरूआत हुई।  

अचानक, अँगरेज़ चले गए। 
तब सुकून था, फिर से थी सौंधी 
खुशबू भीगी पत्तियों की । 

पर समय की बदलती चाल से  
वो आये जो थे तपते मैदान से, 
हर जगह से। 

ऐ जख्मी जमीं, कैसे चाहते हैं वो 
तेरी भरपूर मिटटी, तेरी घायल औलादें। 
उनमें से एक ने मुझे बताया, 'जानते हो, 
तुम्हारा शहर वाक़ई महानगर है।' 

Saturday, 12 April 2014

वक्त नही गुज़रता

tr from Anmole Prasad's English tr of Rajendra Bhandari's Nepali poem, 'Time Does Not Pass'. From Dancing Earth: An Anthology of Poetry from North-East Indiapg. 25-26, 2009. 

दादा, खेतों तक जा पाये उतने सक्षम नहीं रहे 
पिछले बरस, छड़ी लिए वो चौक तक पहुँच जाते थे,
इस बार बस बरामदे तक जा पाये।  
तीन दिन कारावास के बाद, दादा गुज़र गए। 
दादी गुज़र गई ।

फिर माँ मुरझाने लगी 
पहले पहल, वो बाजार से अलग हुई,
फिर चौक से आँगन में सिमटी। 
आँगन से वो चौक में सूखते दाने के लिए हौवा बनी। 
उसकी आँख से रोशनी चली गयी 
उसके पैरों से, खड़े होने की ताकत 
फिर जैसे जैसे उसकी तमन्नायें जाने लगी 
वो खुद-ब-खुद गुज़र गयी ।

एक दिन, एक बनैली लड़की ने मुझसे छेड़-छाड़ की 
पर शांत तालाब के माफिक, मैं किनारे रहा। 
मेरा यौवन गुज़र रहा था।

पीले पतझड़ में, खेतों में
धान भूसा बन रहा था, 
फसल खाद बन चुकी है 
दुनिया हर रोज़ अपने आप गुज़र रही है। 
वातावरण ओजोन के मुँह जा रहा है। 
मुरझाते फूलों और सुखी पत्तियों के साथ  
पत्ती और शाख़ का मुरझाना,
कली और फूल का मुरझाना, 
इन बिदाईयों के बाद 
दबंग कमल भी धरती से मिट गए।  
पर वक्त नहीं गुज़रा  
वक्त अब है ही नहीं
वक्त गुज़रता, अगर होता थोड़ा भी । 

Friday, 11 April 2014

बॉर्डर

tr from Bampada Mukharjee's English tr of Narendra Debbarma's poem in Kokborok, 'The Border'.  From The Oxford Anthology of Writings From North-East India, pg.101, 2011.

हम खड़े थे, कस्बे के तालाब तले  
जब मेरी सात साल कि बेटी बोली -
"देखो, बाबा वहाँ ट्रेन खड़ी है 
आओ हम उसमें चलें।"

"नहीं", मैं बोला,
"यहीं तक है हमारी हदें
हम नहीं लांघ सकते बॉर्डर 
और जाते सकते उस परे। "

छोटी सी मेरी बच्ची नहीं समझी 
चकित हो, वो पूछी, "कहाँ है बॉर्डर?
यही जमीन फैली है वहाँ से यहाँ
क्यूँ नहीं जा सकते हम वहाँ?"

मैंने जितना चाहा उसे सीमा दिखाना 
उतना ही उसने भी चाहा मुझे मुद्दा समझाना । 
कैसे भी वो समझने वाली नहीं थी 
कैसे भी वो मानने वाली नहीं थी । 

अपने मन ही में, मैं बोला 
तुम हो एक मासूम बच्ची 
और इसीलिए, हा  
तुम नहीं जानती 
कहाँ बस्ते हैं बॉर्डर !
अगर तुम बड़ी होती तो देख पाती -
बॉर्डर बताते खम्बे 
उतना दीखते नहीं बाहर खड़े 
जितना इंसानों के मन भीतर छुपे ।

Friday, 18 October 2013

ख़ामोशी

tr. from Harekrishna Deka's English Poem 'Silence'

दो लोगों के बीच ख़ामोशी हो सकती है
पर ख़ामोशी भी ज़बान है
और बोलती है जब लफ्ज़ बेजुबान हों।
ये निजी है,
जबकि लफ्ज़ आम।
ये लगातार बढ़ सकती है।
पहाड़ की चोटी में तब्दील होती
एक खामोश-घाटी।

(thanks to Harekrishna Deka for sharing this poem)

बरसात आ रही है

tr. from Chaoba Phuritshabam's English poem 'Rain Comes Down', from Tattooed With Taboos: An Anthology of Poetry by Three Women from North-East India (2011), p. 116

एक दशक पहले बरसात आई थी, एक साल पहले
बरसात आई थी इक बीते उदास दिन। 
हालांकि, इसने बस कोशिश की उसकी याद मिटाने की
उसकी ख़ता के बोझ बगैर, मुझे अकेले आगे बढाने की
भले ही, मैंने शिकायत नही की
उसके मेरे ख्वाबों को अचानक छोड़ जाने की
भले ही, मैंने उसे सवाल नहीं किया। 
रेत में धुंधलाते उसके पैरों के निशान छेडती मैं बस मुस्कुराई। 
जब जाड़ों में अचानक बारिश की बूँदे मेरे होंठों को नम कर जाती हैं
महसूस होती है मुझे मेरे आसपास तुम्हारी मौजूदगी,
ओह! कंही ये एक नए ख्वाब की शुरुआत तो नही ?

Saturday, 12 October 2013

मेंढकी बरसातें

tr. from Bishash Chaudhary's English tr. of Harekrishna Deka's Assamese poem 'Frog rains'

पिछले मानसून, हमारे इलाके में बरसात नहीं हुयी
हमने मेंढ़कों की शादी करा दी थी,
याद है ? उल्लासपूर्ण नवविवाहित मेंढक-दम्पति सारे क्षेत्र में फुदकते रहे
वो क्षितिज़ के गहरे बादलों की ओर चले गए
हमने बादलों की चट्काहट नहीं सुनी
आख़िर, वो हमारे आकाश के बादल तो नहीं थे,
हमारी योजनायें (और हमारे अनुमान)
बिगड़ गए।
जैसे-जैसे आनंदमय मेंढ़क-जोडे दूर जाते रहे
हम आस लगाते रहे, और प्रार्थना करते रहे
मेंढक-दुल्हनें, लाखों, उम्मीद से हों।

आज, आकाश है बादलों भरा
क्या तुम सुनते हो कडकडाना ?
असाधारण बारिश होगी इस साल, कहता है ज्योतिषी
हमने अब सुना, पहले कभी ना सा, गडगडाना।

देखो, बरसात आ रही है
लगभग, ओला-वृष्टि ! हमारी छतों,
सड़कों, और पहाड़ियों पर भी
ये आवाज़ है मुसलाधार बारिश की
पर नहीं --
ये है मेंढकी बरसात
मेंढक-दुल्हनें अब माँ है
गर्भ के चिकने सुकून में पले लाखों की
हजारों, और हजारों नवजात मेंढक
आ रहे हैं,
मेंढकी बरसात के साथ।

उनके चेहरों पर साफ़ दीखते हैं नयी योजनाओं के निशान,
लिए नए आंकलनों को,
हमारे सिरों पर मंडराते मेंढक झुण्ड
हम अब समर्पण कर रहे हैं नए समय को।

आने वाले बढ़िया समय हेतु
जारी हैं मेंढकी-योजनायें,
रस्म-स्वरूपी और मंत्रों जैसी
रटकर प्रचारित होती।

मेंढकी बौछारें अभी तक पड़ रही है
पीटते, चोट खाते, बरसातों में भींग रहे हैं हम।

(thanks to Himanshu Upadhyaya, Sonu Hari)

Friday, 11 October 2013

आजादी की ओर

tr. from Bishash Chaudhary's English tr. of Harekrishna Deka's Assamese poem, 'Towards Freedom.' From The Oxford Anthology of Writings From North-East India, pg. 16, 2011.

तुम आओगे हमारे साथ। हम तुम्हे हाथ पकड़ ले जायेगें।
सड़क की ओर ना देखना।  हम तुम्हारी आँख ढकेंगे।  
हम तुम्हारे लिए सड़क बनायेंगे।  और तुम्हारे हाथ बाँधेंगे।
हम तुम्हे आजाद मैदान ले जाएँगे।  और तुम्हारी आँखें खोलेंगे।
तुम्हे आजाद मैदान ले जाएँगे।  और तुम्हारे हाथ खोलेंगे।

हंगामा ना खड़ा करना।  हम रटायेंगे तुम्हे नया पहाड़ा।
हम देंगे नया अक्षर।  तमाशा ना खड़ा करना। 

हम ले जायेंगे तुम्हे आजाद मैदां। हम देंगे तुम्हे खुला आसमां । 
तुम्हारा स्वागत करेंगी आज़ाद फुहारें वहाँ।  पंखा करेंगी तुम्हे आज़ाद हवा।

भूख से बिलबिलाना मत । हम देंगे तुम्हे पानी मीठा। 
नंगी टहनियों को ताकना मत।  निहारने को देंगे हम तुम्हे रंगीन चश्मा  ।

हम ले जायेंगे तुम्हे आजाद मैदां, और गवायेंगे तुम्हें हमारा गीत ।
हम पहनाएंगे तुम्हे नया मुखौटा, और सिखायेंगे तुम्हे नई रीत ।

तूम आओगे हमारे साथ।  तुम हमारी हँसी हँसोगे।
तुम नाचोगे हमारा नाच।  तुम हमारे आँसू रोओगे । 

Wednesday, 9 October 2013

अपील

tr. from Mizo Poet Cherrie L. Chhangte's English Poem 'Plea', from The Oxford Anthology of Writings From North-East India, pg. 75, 2011.

समझो मुझको।
मैं चाहूँगी बने रहना एक नारी
ना प्रतिमा, ना परछाई।
हाड़-मांस का शरीर
जिस संग हो इंसानी कमज़ोरी
और, इंसानी भावनायें भी। 

पुराणों से निकालो मुझको।
मेरे कबीले का प्रतिनिधि नहीं,
मैं चाहूँगी बने रहना एक इंसान;
अहंवादी और स्वार्थी
जिसके हों निजी भेद
और, निजी जरूरतें भी।

सँभालो खुद को ।
दिलचस्प पहेली नही,
मैं चाहूँगी बने रहना कोई खुली किताब;
और, ग़र इसमें हो तुम्हारी मनाही
तो पहुँच पाऊँ उस पार, 
पाट हमारे बीच की खाई।

बदलो खुद को ।
फ़ेंक दो धारणाएं और अनुमान,
करते हुए अलग अतीत से वर्तमान
रीति, रिवाजों, और विद्याओं की धरोहर,
स्मृति का कोई धुंधला ख़याल नहीं
मैं चाहूँगी बने रहना एक जमीनी सच्चाई। 

Tuesday, 8 October 2013

एक बूढ़ा कहानीवाचक

tr. from Naga poet Temsula Aao's English Poem 'The Old Storyteller', from The Oxford Anthology of Writings From North-East India, pg. 83-86, 2011.


मैंने यह सोच अपनी ज़िन्दगी जी
कि कहानी कहना मेरी महान परंपरा है ।

वो जो मुझे मिली
मेरे दादा से
बनी मेरी ख़ास निधि
और जो मैंने इकटठा की
अन्य इतिहासकारों से
जुडी इस विद्या में ।

जब मेरा समय आया, मैंने कही कहानियाँ ।

जैसे वो मेरे खून में बहती हों
क्यूंकि हर वर्णन पुनर्जीवित करता है
मेरे प्राण
और हर कहानी मजबूत करती है
मेरे जातीय संस्मरण ।

उस क्षण की कहानियाँ
जहाँ हम छह पत्थरों से टूट कर बने और
कैसे पूर्वजों ने स्थापित किये
एतिहासिक गाँव और
पूजा प्रकृति को ।

योद्धा और बाघ-बहादुर
जाग जाते हैं इन किस्सों में
और वो सारे जानवर भी
जो थे हमारे भाई, तब तक
जब तक,
ना ईजाद कर ली हमने मानवीय भाषा
और कहने लगे उन्हें जंगली ।

दादा ने लगातार चेताया था
कि कहानियाँ भूल जाना
होगा विनाशकारी:
खो देंगे हम अपना इतिहास,
अधिकार, और निस्संदेह
अपनी मौलिक पहचान।

इसीलिए मैंने कही कहानियाँ
मेरी जातीय जिम्मेदारी के स्वरुप
सिखाना युवाओं को
आस्तित्व और जरूरी प्रथाओं को सँभालने की कला
जो मिल सके दूसरी पीढ़ी को ।

पर अब आ गया है नया जमाना 
विस्थापित करता वो सब जो है पुराना ।

मेरे अपने पौते नकारते है
हमारी कहानियाँ मानो हो सदियों पुरानी बकवास
व्यर्थ आज, तमाम
और पूछते हैं
किसे चाहिए टेढ़ी मेढ़ी कहानियाँ
जब क़िताबों से चल सकता है काम ?

मेरे अपनों के इनकार ने
रोक दिया है बहाव
और कथाएँ लौटने लगी हैं
मन की दुर्गम गुफाओं मे
जहाँ कभी गूंजती थी कहानियाँ
अब बसती है अकल्पनीय ख़ामोशी।

तो जब याददाश्त डगमगाने लगती है
और शब्द लड़खड़ाने
तब मुझे जीत जाती है एक पाशविक लालसा 
खींच लेने की
उस पहले कुत्ते से उसकी हिम्मत*
और सौंप देने की, उसकी आँतों में छुपी लिपि को,
मेरी सारी कहानियाँ ।

(* ओ-नागा समुदाय के अनुसार कभी उनके पास एक चमड़े पर अंकित लिपि/ आलेख था जिसे एक दिवार पर टांगा गया था ताकि सब उससे पढ़ और सीख सकें । पर, एक दिन एक कुत्ता उसे खींच कर खा गया । तबसे, लोगों का कहना है कि उनके जीवन का हर पहलू -- सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, और धार्मिक -- मौखिक प्रथाओं द्वारा जन स्मृति का हिस्सा रहा है ।)

Monday, 7 October 2013

मुझे

tr. from Assamese poet Aruni Kashyap's English poem 'Me'.

मेरे पास भी हैं शब्द।
चिकनी-मिट्टी जैसे उन्हें मैं ढाल सकता हूँ
मेरे पास हैं भाषाएँ, साहित्य
वन गीत ।

सदियों पीछे जाते वो,
भूकंप, पीढ़ी दर पीढ़ी ।
दादियों ने उन्हें फैलाया था; सुपारी के साथ
मधु मास तले आँगन पे,
बारिशों जैसे, वो भी भिगा जाते हैं मन और बहुत कुछ --
पहले भीगे हुए, जिनके पास समय की कमी है,
और नए जिनके पास कहानियों की ।

समय के साथ, वो भी निकल आए हैं
मौसमों और कोहरों की तरह, रहने हमारे पास ।

मेरे पास हैं धुनें भी, क़िताबे
केंचुओं के खून से छाल पर लिखी हुई;
वो अलग हैं,
स्वछंद, मेरे सीने में छुपी नदियों की भाँति
कहावतों से भरी,
उदास, फिर भी प्रचंड ऊर्जा से उमड़ती हुईं
विरह में गाती कोयलों की भाँति
बेनाम, पहाड़ियों के परे
जहाँ नदियाँ और बरसात जन्म लेतीं हैं
बहने के लिए कहानियाँ, प्राण बनकें।

मेरा इतिहास अलग है,
दादियों, नदियों, पहाड़ियों, हरे पेड़ों के पीछे से गाने वाली कोयलों
और सत्रह विजयों से परिभाषित ।

मेरे शब्द: उनमें दंतकथाएं हैं ।
जैसे मेरी रगो में बहती है चाय-पत्ती
रक्त नहीं ।
कहानियाँ, पिछली कब्रों से बोलते नवजात शिशुओं की 
आदमी में बदल जाने वाले कुत्तों की
बकरियों, भेड़ों में बदल जाने वाले आदमियों की
और, नींबू, लौकी, कुमुद बन पिछवाड़े गाने वाली लड़की की ।

और मैं अभी भी प्रतीक्षा में हूँ एक स्नेहपूर्ण आलिंगन की,
मोर की तरह बेक़रारी में सूखता, मेरा गला ।
मेरी जमीन से निकलती सारी नदियाँ
बरसातों भरी दंतकथाएँ,
मेरी प्यास नहीं बुझा सकती,
मुझे चाहिए तुम्हारा प्रेम
क्या तुम नहीं देख सकते,
मैं अलग हूँ ?

मेरे पास भी हैं शब्द,
भाषाएँ, साहित्य
और कथाएँ तुम्हे बताने को
क्या तुम उत्सुक हो सुनने को, थोडा भी ?

(thanks to Samhita Barooah)