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Friday, 22 December 2023

हलकान

थक चुकी हूँ मैं
इस इंतजारी में,
और तुम?

कि बने बेहतर,
खूबसूरत और मेहरबां दुनिया?

चलो चाकू ले,
बींच चीर दे दुनिया
देखें, चमडी खा रहे हैं, 
कौन से कीड़े, दुनिया

Hindi Tr. of Langston Hughes' Tired

Tuesday, 27 December 2022

मैं नए साल में जा रही हूं

और गए साल वापस आ रहे हैं
बालों से गुजरती हवा के माफ़िक 
जैसे मजबूत उंगलियां थामे
मेरे तमाम पुराने वादे और
मुश्किल होगा झटक देना
वो जो मैंने खुद से
खुद के बारे में कहा 
जब मैं थी सोलह की और
छब्बीस की और छत्तीस की
छत्तीस भी पर
मैं नए साल में जा रही हूं
और अपनी चाहतों को मांगते हुए और
जा रही हूं खुद को माफ करने

Hindi trans of Lucille Clifton's I am running into a new year.

Friday, 26 August 2022

खयाल

यह मेरा करतब है
शुरुआती दौर में
वो बन जाना
जिसे तुम जानना चाहो
फिर वैसा रहने में
लाखों कुशल तरीकों से
चूकते जाना 
हमारी सदी के गुजरने तक।

Hindi Trans. of Tom Snarsky's Wish

Tuesday, 16 August 2022

हल्की बूंदाबांदी

दिनभर सितारे देखतें हैं दूर से
माँ बोली अब चलती हूं
तुम तन्हा हुई तो भी सब ठीक होगा
तुम्हे पता हो या नही तुम्हे पता होगा
बूढ़े घर को सुबह बारिश में देखना
फूल पानी ही तो हैं
सफेद बादलों से उन्हे जगाता सूरज
पहाड़ी पैबेंदकारी को चूमते
परवर्ती जीवन के धुले रंग
जो यहां थे तुम्हारे होने से बहुत पहले
जलती हुई दुनिया में भी 
देखो जागते हैं वो निसंदेह
(Hindi Trans of W.K Merwin's Rain Light)

Saturday, 13 August 2022

विकल्प

 मैं, पौधों की छटाई करने,

घर के पहाड़ी रूख की तरफ गई, ताकि पहाड़ी बर्फ साफ़ दिखे। जब, हाथों में कुल्हाड़ी लिए, ऊपर देखा, ऊपरी शाखाओं में एक घोंसला दिखा। मैंने उसे नहीं काटा। मैंने औरों को भी नहीं काटा। अचानक, हर पेड़ में, अनदेखा घोंसला, जहां पहाड़ होता।
(Hindi Trans. of Alice Walker's Choices)

Friday, 12 August 2022

फिर भी

इश्क़, गर इश्क़ है, मिटता नही
हममें ही रच बसता है,
जैसे जमीन से लिपटा सोना,
कि धूप खिले,
जी उठे।
(Hindi trans. of Alice Walker's Even So)

Sunday, 7 August 2022

एक झरने में, रेक्जाविक

मुझे अभी भी लगता है,

कि दुनिया
वो रोटी है
जो आधी
तुम्हारे लिए ही
मैं थामे खड़ी हूं।

(Hindi Trans. of Eileen Myles- 'At a waterfall, Reykjavik')

Wednesday, 3 August 2022

वहां पहुँचना...

दिमाग़ कहे: यह नदी हैं हर तल से परे दिल कहे: बनाए यहीं पूल के सिलसिले

(Hindi trans. of Cleo Wade's Getting There)

Friday, 8 May 2020

गर चाँद ना हो, तो क्या होगा?

महीने ना होंगे,
ठहरा हुआ समंदर होगा,
ना ज्वार-भाटे,
ना चमकीली रातें,
ना तारों की लुप्पा-छुप्पी,
ना चहरे, ना चंदा के तराने होंगे,
ग्रहण का डर होगा,
जगह नही, खड़े हो, देख सको
दुनिया का जी उठना।

(Hindi trans. of Rebecca Elson's What if there were no moon?)

Tuesday, 21 January 2020

बस इतनी सी बात है...


I
कुछ मोहब्बतें बिस्तर में सिमटती हैं,
कुछ रूह में उतरती है,
और कुछ बस खामाखाँ होती हैं,
क्या ही होता जो
मेरी रूह तेरा बिस्तर होती।

II
कुछ मोहब्बतें बिस्तर में सिमटती हैं,
कुछ रूह में उतरती है,
और कुछ बस खामाखाँ होती हैं,
कुछ इधर, कुछ उधर
तुम खामाखाँ ही हो,
ना इधर, ना उधर।

Sunday, 19 January 2020

तलब | ख़लल

आज बड़ी तलब है
तुम से बात करने की,
लफ़्ज़ों के लिहाफ़ मे लिपटी
मोहब्बते सिलसिलेवार नही उतरती,
धूप सी बिखर जाती हैं,
धान बन खिल उठती हैं,
खनकती हुई भीतर कहीं।
सोच थी मेरी
तुम तक पहुंचने की,
रूह से रूह को राहत है
रूमी की ऐसी रूमानी बातें
तलब को ख़लल कर गई।

Tuesday, 16 October 2018

तुम कब सीखोगे?

वो अकबर गुज़र गये,
जो अनारकली को दिवारों में चुनवा
तख्तनशीं रहे।
पर अनारकली के गीत,
दुर्गा की हुँकार का
वक़्त नही गुज़रता।
गवाह? अजी मेरी ज़मीं
- अच्छे दिन, ओछी हरकत
का बयानामा यहीं।
फिर ना कहना किसी ने समझाया नहीं
रेत, ग़ारा, ईंट लाते तुम्हे
मिट्टी-पलीत होने का मंज़र
दिखाया नहीं।

Monday, 2 July 2018

गंगा

एक नदी, कितनी राख
कब स्वाहा हुयी कहानियां
कुछ बह गयी
कुछ रह गयी 

उलझन

कल 
मेरे रुमाल की हर एक गाँठ
किसी ख़ास ख़्वाहिश की दास्ताँ थी
जिसमें तुम थे और मैं थी।
आज
खुली गाँठें, 
रुमाल की सिलवटों में
जिरह कर रहे हैं
जिसमे तुम हो और मैं भी।

Thursday, 3 March 2016

जे.एन.यू के लिये

(In solidarity, Hindi tr of my friend Akhil Katyal's poem' For JNU')

तुम सूरज चबा कर थूक सकते हो यहाँ,
मुस्टण्डों को धुल चटा सकते हो तुम यहाँ,
जनाब, विश्व विध्यालय की है बात यहाँ,
कोई राजा का दरबार नहीं, तलवों पर हो हम जहाँ !

Tuesday, 19 May 2015

'फिर लिखो, तूम'

(These are for you Akhil - thank you for not giving up on me!)

I
कैसे लिखूँ  
कि उदासी उबासी बन 
भीतर उबल रही है?
ख्याल बहुत हैं 
जुगाली के लिए, 
पर तंज़ करता अक्स 
दीखता है बैठे, घात मारे 
और, हर अक्षर उभरते उभरते 
सिकुड़ जाता है,
लाड़ की तलाश में।

II

उदास उलझनों में, 
पालथी मारे लफ़्ज़
तर्जुमे की बैसाखियाँ पकडे 
लड़खड़ाते, 
निकले हैं, अब 
हम-बीती का कारवां बनाते।

Friday, 2 January 2015

रंग, शब्द, धुन

tr from Anmole Prasad's English tr of Rajendra Bhandari's Nepali poem, 'Colour, Word, Tone.' From, The Oxford Anthology of Writings From North-East India, 2011, pg. 24-25

रात के आलिंगन में घुटती 
शहरी रोशनियों के माफ़िक, 
हम सब के भीतर बुझ रही है 
विश्वास कि ज्योति। 

किसी चीख के समान खुरदरी हमारी आवाज़, 
किसी मातम के समान दुःखद। 
किसी फूल के प्राकृतिक रंगों के समान
संजो लिया है दम्भपूर्ण पैतृक देवताओं को 
हमने अपने दिल-मंदिर में।

हम, सोल्ज़ेनित्स्यन 
अपने दिल के साइबेरियन कैम्पों में। 
हम, ट्रोट्स्की
सिर्फ रात की रोशनी में
एक दूसरे के चहरे देखतें हैं। 
नहीं ढूँढ पाते हम पौ फटने तक भी
हमारी गुल्लक, अलमारियां, बक्से, 
वंशजों के अवशेष 
राख में। 

हमारे शब्दों और धुनों की नक़ल करते, 
गीदड़ और भेड़िये हमें सुनाते हैं लोरियाँ। 
भुलक्कड़पन के अफ़ीमी संगीत में, 
किसी फ़र्ज़ी सपने में लेते हैं हम झपकियाँ। 

जिस दिल कि मौलिक संवेदनाएं ही 
भस्म कर दी गई हो --
उसे कंहाँ घर?  कहाँ बीहड़?

एक धुँधली जगह

tr from Arunachali poet Mamang Dai's English poem, 'An obscure place'. From Dancing Earth: An Anthology of Poetry from North-East India, pg. 88-89, 2009. 

हमारे वंश का इतिहास कहानियों से शुरू होता है ।
हमें नहीं पता कि जो भाषा हम बोलते हैं 
वो किसी लिखित अतीत से जुडी हैँ ।
कुछ भी निश्चित नहीं है।
वहाँ पहाड़ हैं । आह, वहाँ पहाड़ हैं । 
हमने हर एक चोटी चढ़ी। हम नदी किनारे सोयें । 
पर जीत के बारे में अबतक ना बोलें ।  

एक धुँधली जगह शिकारी को बार बार तंग करती है ।
इनाम दूर फिसल जाता है। 
कल महिलाओं ने अपना चेहरा छुपा लिया ।
बच्चों को बोलने से मना कर दिया । 
कल हमने कुछ आदमियों को पनाह दी थी,
जो जन्मभूमि के ख़ातिर हमारी पहाड़ियों को लांघ गए, उन्होंने कहा -- 
जो जानते हैं कि जानना क्या होता है, 
और सोते हुए घर, आदमी, और गाँव पत्थर बन गए । 

गर कोई मृत्य ना हो, तो खबरें शांत होती हैं 
गर केवल शांति हो, तो हमें अशांत होना चाहिए । 
सुनो, प्रार्थनाओं कि आवाज़ दबी-दबी होती है:

गर कोई अजनबी यहाँ से गुजरे 
तो उसे आकाश देखने देना ।
धूएं का बादल चींटियों का पीछा करता है ।
देखा!  उन्होंने जंगली बिल्ली को काट दिया 
और हार्नबिल को ग़हरी नींद में दफ़ना दिया । 
अजनबियों के लफ़्ज़ हमें उस धुँध में ले गए, 
जो उससे ग़हरी है जिसे हम पीछे छोड़ गए थे 
रोते हुए, लहलहाती घास के मैदानों के माफ़िक 
जहाँ हमारे पूर्वजों कि हड्डियां दबी हैं 
सुन्दर विचारों से घिरी ।

Sunday, 13 April 2014

फ़तह

tr. from Desmond Kharmawphlang's English tr of his Khasi Poem, 'The Conquest'. From The Oxford Anthology of Writings From North-East India, pg. 61-62, 2011. 

अपने शहर की बात करते 
मैं कभी नहीं थकता। 
गर्मियों में गर्भित आकाश 
भावी बरसात से भरा,
सर्दियां पहुंची, अनमने सूरज के साथ 
छूती अकड़ी हई पहाड़ियां, झील पे 
ख्वाबों की कश्तियाँ । 

बहुत पहले, आदमी सुरमा के पार गए 
कारोबार करने, औरतों को घर लाने 
अपने वंश को बढ़ाने । 

फिर अंग्रेज आये 
सौगात लिए गोलियों, सुपारियों 
और धर्म की। 
लगातार जीत की तमंचे की नौंक पर 
शुरूआत हुई।  

अचानक, अँगरेज़ चले गए। 
तब सुकून था, फिर से थी सौंधी 
खुशबू भीगी पत्तियों की । 

पर समय की बदलती चाल से  
वो आये जो थे तपते मैदान से, 
हर जगह से। 

ऐ जख्मी जमीं, कैसे चाहते हैं वो 
तेरी भरपूर मिटटी, तेरी घायल औलादें। 
उनमें से एक ने मुझे बताया, 'जानते हो, 
तुम्हारा शहर वाक़ई महानगर है।' 

Saturday, 12 April 2014

वक्त नही गुज़रता

tr from Anmole Prasad's English tr of Rajendra Bhandari's Nepali poem, 'Time Does Not Pass'. From Dancing Earth: An Anthology of Poetry from North-East Indiapg. 25-26, 2009. 

दादा, खेतों तक जा पाये उतने सक्षम नहीं रहे 
पिछले बरस, छड़ी लिए वो चौक तक पहुँच जाते थे,
इस बार बस बरामदे तक जा पाये।  
तीन दिन कारावास के बाद, दादा गुज़र गए। 
दादी गुज़र गई ।

फिर माँ मुरझाने लगी 
पहले पहल, वो बाजार से अलग हुई,
फिर चौक से आँगन में सिमटी। 
आँगन से वो चौक में सूखते दाने के लिए हौवा बनी। 
उसकी आँख से रोशनी चली गयी 
उसके पैरों से, खड़े होने की ताकत 
फिर जैसे जैसे उसकी तमन्नायें जाने लगी 
वो खुद-ब-खुद गुज़र गयी ।

एक दिन, एक बनैली लड़की ने मुझसे छेड़-छाड़ की 
पर शांत तालाब के माफिक, मैं किनारे रहा। 
मेरा यौवन गुज़र रहा था।

पीले पतझड़ में, खेतों में
धान भूसा बन रहा था, 
फसल खाद बन चुकी है 
दुनिया हर रोज़ अपने आप गुज़र रही है। 
वातावरण ओजोन के मुँह जा रहा है। 
मुरझाते फूलों और सुखी पत्तियों के साथ  
पत्ती और शाख़ का मुरझाना,
कली और फूल का मुरझाना, 
इन बिदाईयों के बाद 
दबंग कमल भी धरती से मिट गए।  
पर वक्त नहीं गुज़रा  
वक्त अब है ही नहीं
वक्त गुज़रता, अगर होता थोड़ा भी ।