Thursday, 4 August 2011

मैं का से कहूं ?

मैं का से कहूँ; ओ री सखी,
क्यूँ आये मोहे लाज |
सब प्रश्नो में धीर धरूँ मैं
फिर क्यूँ ;
मन घुंघरू बन बाजत आज?
मैं का से कहूँ ओ री सखी,
क्यूँ आये मोहे लाज |
जिया घबराए;
बूझ ना पाए,
क्या है दूर, क्या साथ? सखी री,
मैं का से कहूँ; ओ री सखी,
क्यूँ आये मोहे लाज |
वो हँस दीने;
झीने झीने,
प्रीत में बांधे सुर सात, सखी री,
पलकों से अपनी मुझको देखा;
फिर झट बंद कर ली बाट, सखी री,
इन से परे सब दूर है राधे,
इन में समाये तो साथ |
मैं का से कहूँ; ओ री सखी;
क्यूँ आये मोहे लाज |
उनके नयनो ने;
एक ही पल में,
पट खोल दिए सारे आज! सखी री;
पट खोल दिए सारे आज!
मैं का से कहूँ, ओ री सखी;
क्यूं आये मोहे लाज...

Middle dichotomy

I have often wondered which is more free,
roots that explore the depths;

branches that explore the heights;
or is it the stem that anchors the two;

keeping both in sight?
Fuck, comes a friend's response
its your 'middle class' talking
not letting free and not letting go
but keeping the disguise quite!