Wednesday, 30 May 2012

टूटते मकान

Photo by Javed Iqbal
बंद दरवाजों के सामने
आज पहरेदार हैं कईं |
गारे मिटटी के इंसान,
गारे मिटटी के मकान,
इंसानो के भी;
मकानो के भी;
आज खरीदार हैं कईं |
ठहरी सी, उलझी सी
देहरी पर खड़ी है ज़िन्दगी
कभी अन्दर पनपती थी
आज बाहर सुलगती सी
सिसकना भूलकर
टूटती दीवारों के साथ
बिखरते रिश्तों को ताकती
छटपटाती, सीता
अटपटे सवालो से झूझती,
'कानून मेरे लिए? मैं कानून के लिए?
या, मैं भी कानूनन ही हूँ, बस यूँ ही?'
ना रोजी, ना रोटी
और अब बाकी इंट पत्थर के निशाँ भी नहीं
इस रामराज्य में, इंसान के कम
कानून के सिपहसलार हैं कईं |

Please see: Days of Demolition, a Photo album by Javed Iqbaal
Also, Day after demolition attempt

Friday, 25 May 2012

छिपकली

वो मचान
जहाँ तुम चढ़े बैठे हो,
उससे सब छोटा ही दीखता है,
शायद ऐसा भी लगता हो
कि; सब तुम से ही है
जैसे कोई छिपकली हो,
छत से ऐसा जुड़ाव
कि गोल गोल आँखो का मुआयना
खुद तक ही
सीमित रहे,
लगे कि वो नीचे उतरी
दुनिया उथलपुथल हो जाए शायद;
तुम्हे देखकर मैं सोचती हूँ;
वो छिपकली कैसे होतीं हैं
जो जमीन पर घूमती मिल जाती हैं,
क्या वो अचानक जमीन पर गिर जाती हैं
और उससे जुड़ जाती हैं?
या कभी यूँ ही कुछ हो जाता है कि;
छत से अपने जुड़ाव,
उससे दूर होने के अलगाव
को एक छलांग में भूल जाए,
पैराशूट खुल जाए मानो,
डर त्रिशंकु बन पीछे छूट जाए
और तुम उतर आओ जमीन पर;
पता चले,
छत से चिपकी रहने वाली छिपकली
आखिर क्या पर पाती है
नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे
आने वाली ही तो
सिंहगढ़ का किला दिलाती है |


Sunday, 20 May 2012

स्याही ख़्वाब

लिखना तो बहुत कुछ था
पर कैसे लिखूं
कि ख़्वाबो कि स्याही काली क्यूँ है,
क्यूँ नीले सुनहरे आसमान
का रंग बर्फीला हो गया,
कैसे धानी घास
दूब से मुंह मोड़े है,
और क्यूँ हर शरारत
हर हरकत से हैरां ये शाम है?
१९४७ में रंगीले ख्वाब जो
हमने धानी घास से सुनहरे आसमान को देखते बुने थे;
वो अब बर्फीली दूब के साथ इस शाम के हमसफ़र हैं
और हम तुम जो हैं भी और नहीं भी,
इन्हें देखतें हैं और सोचतें हैं
क्या लिखें, किसे लिखें;
क्यूंकि किसी क्रांतिकारी की याद अब
सहानुभुतिक अपराध है,
नियामगिरि, जैतापुर, कून्दकुलम में सत्याग्रह
राष्ट्रद्रोह कहलाता है,
लिखने-पढने या कुछ गढ़ने की आज़ादी से
संविधान नाराज़ हो जाता है,
और ऐसा क्यूँ कर हो ये पूछा
तो हम और हमारे प्रश्न दोनो ही माओवादी होतें हैं,
गाँधी के तीन बन्दर आने वाले कल की तस्वीर है
जिनके गले में तख्ती बंधी है-
'आज़ादी वो जेल है जिसकी हदें हम खुद तय करते है',
ना बोले, ना लिखें, ना पढ़ें, ना सोचें, ना समझें,
ना कहें, ना पूछें, ना हँसे, ना रोयें-
-आज़ादी की शर्तें साफ़ हैं
पर ख़्वाबो की गैरत तो देखिये
स्याही बने जा रहे हैं
और इसी स्याही से धानी घास पर कुछ लिखें जा रहे है ....

Wednesday, 2 May 2012

किस्से

किस्से कैसे कहें
किसे कहें
क्यूँ ?
कब
किधर कटें
कसे कसे
किस्से
कसमसे
क्यूँ ?
किससे कहें
किधर
कटे कटे
किस्से
कटे किससे
क्यूँ ?
कटे कटे
कसे कसे
किस्से
क्या किससे
कहें
कहें क्या
कब
किससे
कौनसे किस्से
क्यूँ?