Sunday, 17 July 2011

केंचुओं

तुम कहाँ हों ?
गीली मिटटी में गट्ठे पड़े देख;
उनसे गुजरती सुरंग को देखा .
पर तुम नहीं मिले.
तुम्हारी खोज खबर लेने अक्सर निकल पड़ता है मेरा एक दोस्त;
उसे बर्दाश्त नही कि झूले के चाव में मैं तुम्हे भूला बैठूं;
हो सकता है कल के अखबार में गुमशुदा कॉलम में तुम्हारा जिक्र हो;
यह भी हो सकता है कि अपनी बनायीं सुरंगो में तुम गुमसुम बैठे हों,
पर, कहीं खुले में उठते बैठते, गिरगिट से पलटते, उलटते और हर चीज़ पर फिसलते;
दो हाथो से लडखडाती जबान को सँभालते,
इस जीव को देखकर तुम्हे वही तो नहीं हो गया जिसे ये 'Identity crisis' कहता है?
आस्तित्व की इस लड़ाई में हार मत जाना दोस्त,
तुम्हारी मिटटी को इसने रसायनों से भले ही घायल कर दिया हो
पर नरम से कड़क होती अपनी प्रेमिका को तो देखो,
उसका प्रतिरोध ही तुम्हारा होसला है,
तुम्हारे स्पर्श को तरसती,
सरस ही बिखरती
बरबस टकटकी बाँध तुम्हे ढूँढती,
अपनी बेखुदी में बस इतना ही पूछती
...केंचुओं तुम कहाँ हों ?

Also check:
India’s soil crisis: Land is weakening and withering

4 comments:

D said...

Aptly put. Nice work.

chirag said...

nice one and sach kaha aajkal kechuye kam dekhane ko milate hain pahle ki tulna main

संजय भास्कर said...

तुम्हारी खोज खबर लेने अक्सर निकल पड़ता है मेरा एक दोस्त;
उसे बर्दाश्त नहीं की झूले के चाव में मैं तुम्हे भूला बैठूं;
हो सकता है कल के अखबार मैं गुमशुदा कॉलम में तुम्हारा जिक्र हो;
बहुत गहरे शब्‍द इन पंक्तियों में ।

Shalini Sharma said...

@D: Thanks :)
@chirag: yes i also noticed it once my friend told me how their number is going down drastically.
@Sanjay:Am glad you find some depth in those sentiments. However, this poem belongs to the one who inspired.