Monday, 9 November 2009

खुदा

आज राह में, मेरा खुदा खो गया
कब हुआ, कैसे?
ये न पूछो मुझे
दोस्तो याद थी, सारी हिदायतें;
कबूल भी थी हमें,
वक्त की रवायतें;
पर कहानी ये कोइ,
नई तो नही;
तुम न पूछो मुझे;
क्या गलत क्या सही
संभाल कर ही तो मैंने,
बढाया कदम;
रंगीली खुमारी,
ने जब दाए सितम;
बेकस यकीन था;
बेखुद जबान,
सुनाया अचानक;
रुखसती का फरमान,
अभी जरा सा उछला ही था, दिल मेरा;
इश्क कमबख्त ने जब पलट दी निगाह
खुद तो कुछ किया ही नही;
उसने जो कहा बस सूना था वही,
वो चला तो रेत पे;
जैसे बन गए निशाँ,
निशानो से हकीकत का;
तय किया फासला,
बड़ी देर तक मन में,
चली ये जिरेह
वो वहां था,
और हम खड़े थे यहाँ;
टुकडो में आईना;
था, दरमियाँ
खुद को तो जाना,
यार को भी जान लिया;
और; नामालूम कैसे,
इस गुफ्तगू में;
अपना खुदा पा लिया

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