Saturday, 5 November 2011

बात ही बात में...

दिन की और रात की;
रात की बात की;
बात ही बात में;
रात भी काट दी;
काट के पार थी;
आरजू की चांदनी;
फिर सुबह और शाम थी;
शाम की तो बात थी,
जब शमा जल उठी;
जल के यूँ पिघल उठी;
जैसे कोई जाम हो,
जाम की संगीनियाँ;
धडकनों में आम हो,
बन के दिन रात ही;
चांदनी भी ढल गई;
तुम वहीं थे, बस वहीं;
वहीं, जहाँ यकीन था;
कभी तो होगी बात भी;
दिन की और रात की;
बात ही बात में;
शाम ये भी काट दी...

1 comment:

anand said...

umda....mazedaar